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GST/Textiles: 17.5 से 13.5% रह जाएगा इफेक्टिव टैक्स, सस्ते होंगे हर तरह के कपड़े

जीएसटी काउंसिल की टेक्सटाइल पर 5 फीसदी टैक्स की घोषणा के साथ तय हो गया कि सूरत में बनने वाले सभी तरह के कपड़े सस्ते होंगे। वर्तमान में एक्साइज और वैट मिलाकर 17.5 फीसदी टैक्स लगता है और इसका कोई रिफंड नहीं मिलता लेकिन अब सिर्फ 5 फीसदी टैक्स लगेगा और यही टैक्स इनपुट क्रेडिट के रूप में रिफंड भी वापस आएगा।

हालांकि पहले सिर्फ यार्न पर टैक्स लगता था और अब हर लेवल पर टैक्स लगेगा। लेकिन उत्पाद ग्राहक के हाथ में पहुंचने तक भी इफेक्टिव रेट 13.5 फीसदी रहेगा। काउंसिल ने ट्रांजिशन रूल्स और बाकी चीजें भी तय कर दी हैं।

जीएसटी के बाद काफी लोग ऐसे रहेंगे जो पहली बार टैक्स स्लैब में आएंगे। फैब्रिक जैसे सेग्मेंट के जो अभी तक टैक्स चेन से बाहर थे वहां अंतर पड़ेगा। ड्रेस मटेरियल, साड़ी आदि पर टैक्स नहीं था अब वो भी टैक्स स्लैब में आ जाएंगे।

हालांकि, यह कहना कि इससे छोटे कारोबारियों को नुकसान होगा गलत है क्योंकि कपड़ा बनाने वाले रॉ मटेरियल पर पहले ही वो टैक्स दे रहे थे यानी यार्न पर टैक्स वह दे ही रहे थे। अब कॉटन के कपड़ों पर पहली बार 5 फीसदी और हैंडमेड कपड़ों पर 18 फीसदी टैक्स लगा है, इसलिए यह दोनों ही तरह के कपड़े महंगे हो जाएंगे।

एक हजार रुपए से ज्यादा के ब्रांडेड कपड़ों पर 12 फीसदी जीएसटी होगा, पहले भी एक्साइज और वैट मिलाकर 12 फीसदी ही टैक्स लगता था, ऐसे में इन कपड़ों की कीमतों में अंतर नहीं आएगा।

एक हजार रुपए से कम के कपड़ों पर 5 फीसदी जीएसटी लगेगा, जबकि पहले एक्साइज व वैट मिलाकर 7 फीसदी लगता था। यानी इस तरह के कपड़े भी सस्ते हो जाएंगे।

एक कमी : समान टैक्स नहीं हो पाया
कपास और सिंथेटिक फाइबर पर एक समान जीएसटी लगाने का मौका सरकार ने खो दिया है। उनका मानना है कि एक समान कर लगा कर सरकार गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धा को बढ़ा सकती थी।

एक फायदा : ग्राहक को फायदा देना जरूरी
जीएसटी बिल में एक एंटी प्रोफिटिंग क्लॉज का प्रावधान किया गया है जो यह सुनिश्चित करता है कि जीएसटी के अंदर इनपुट क्रेडिट का लाभ लेने वाले कारोबारी आगे जा कर खरीदार को भी इसका फायदा पहुंचाएंगे।

एक राहत : पुराने स्टॉक पर 60% रिफंड
सरकार ने कारोबारियों के मौजूदा भंडार यानी स्टॉक पर चुकाए गए जीएसटी पर इनपुट रिफंड की सीमा 40 फीसदी से बढ़ाकर 60 प्रतिशत कर दी है। इसके लिए बिल यानी इनवॉयस की जरूरत भी नहीं रह जाएगी।

तीन बातें 100% तय

कपड़े को जीएसटी से छूट नहीं
उम्मीद थी कि आवश्यक आवश्यकता होने के कारण टेक्सटाइल को जीएसटी से छूट मिलेगी। लेकिन यह तय हो गया कि टेक्सटाइल उद्योग जीएसटी में रहेगा।

कॉटन का कपड़ा महंगा
कॉटन पर पहले किसी तरह का टैक्स नहीं लगता था अब उस पर पांच प्रतिशत टैक्स लगेगा। मतलब साफ है, कॉटन के कपड़े हर हाल में महंगे होंगे।

जीएसटी 1 जुलाई से ही लगेगा
जीएसटी लागू करने की तारीख आगे नहीं बढ़ेगी। और सभी राज्यों के वित्तमंत्रियों से हरी झंडी के बाद तो यह तय हो गया कि जीएसटी युग की शुरुआत एक जुलाई से ही होगी।

तीन पर संशय भी

जाब वर्क और एंब्रायडरी पर 18 प्रतिशत जीएसटी लगना है। टेक्सटाइल का जॉब वर्क किस सेगमेंट में आएगा।

एमएमवाई व एमएमएफ पर 18% जीएसटी तय है, लेकिन पॉलिएस्टर फाइबर और यार्न पर जीएसटी की दर क्या होगी ?

स्टॉक पर डीम्ड क्रेडिट की सीमा 40 से बढ़ा कर 60 कर दी लेकिन कैसे और कब दिया जाएगा?

कंपोजीशन स्कीम चुनी तो पुराने टैक्स का क्रेडिट नहीं

जीएसटी काउंसिल ने शनिवार को रिटर्न के नियमों को भी मंजूरी दे दी। इसके मुताबिक कंपोजीशन स्कीम का विकल्प चुनने वाले कारोबारियों को पुराने टैक्स का क्रेडिट नहीं मिलेगा।

ईकॉमर्स में ऑपरेटर और सप्लायर के रिटर्न की मैचिंग आसान की गई है। इसके अलावा 5 साल के अनुभवी सेल्स टैक्स प्रैक्टिसनर या टैक्स रिटर्न प्रिपेयरर जीएसटी प्रैक्टिसनर बन सकते हैं।

टैक्स एक्सपर्ट शुभम मित्तल के अनुसार, मान लीजिए अभी कोई ट्रेडर टैक्स क्रेडिट का लाभ ले रहा है। जीएसटी लागू होने के बाद उसने कंपोजीशन का विकल्प चुना। उसके पास कोई पुराना इनवॉयस है तो उसे उसका क्रेडिट नहीं मिलेगा।

शुभम के मुताबिक ईकॉमर्स में ऑपरेटर और सप्लायर के रिटर्न की मैचिंग आसान कर दी गई है। अब सिर्फ ‘सप्लाई की जगह’ और ‘टैक्सेबल वैल्यू’ का मिलान किया जाएगा। पहले इसमें सप्लायर की जीएसटीआईएन, टैक्स की रकम आदि को बताना भी जरूरी किया गया था।

अभी जो लोग सेल्स टैक्स प्रैक्टिसनर या टैक्स रिटर्न प्रिपेयरर के तौर पर रजिस्टर्ड हैं, वे नई व्यवस्था में जीएसटी प्रैक्टिसनर बन सकते हैं। हालांकि इसके लिए 5 साल का अनुभव जरूरी होगा। प्रैक्टिसनर से जुड़ा एक और नियम बदला गया है। उनके द्वारा जमा रिटर्न पर कारोबारी की ऑनलाइन सहमति ली जाएगी।

तय समय में जवाब नहीं देने पर उसे ‘हां’ मान लिया जाएगा। लेकिन रिफंड, रजिस्ट्रेशन में संशोधन जैसे मामलों में प्रैक्टिसनर द्वारा जमा रिटर्न पर कारोबारी जब तक सहमति नहीं देगा, तब तक उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा।

Source: Bhaskar.com